Released in 1986, Jaanbaaz remains one of the most stylish and ambitious films of 1980s Hindi cinema. Produced and directed by Feroz Khan, the film blended family drama, romance, action, and crime within a visually lavis...
View on Facebookबाँके की माँ ने कहा “तुम ये तो सोचो भय्या, बाँके और पार्वती जब खिलोनों और गुड़ियों से खेला करते थे तब से एक दूसरे से प्यार करते हैं।”
पार्वती का पिता चरनदास गुस्से में तमतमा उठा और बोला- “मेरे लिए शादी गुड़ियों का खेल नहीं है। मैंने अपनी बेटी को कौलेज तक इसलिए नहीं पढ़ाया कि एक दिन मैं उसे बाँके जैसे गँवार और अनपढ़ के पल्लू से बाँध दूं।”
ये सुनकर बाँके आग बबूला हो गया। उसने चरनदास के सामने ही क़सम खाई कि वो उसकी लड़की से कहीं ज़्यादा पढ़ी लिखी कहीं ज़्यादा सुन्दर लड़की से शादी करके दिखा देगा। बाँके अनपढ़ जरूर था लेकिन अव्वल नम्बर का किसान था। उसे कृषि पंडित का खिताब मिला हुआ था। सारे गाँववाले उसे बेहद प्यार करते थे। अपने दोस्तों की सलाह से उसने शहर जाकर एक सुन्दर और पड़ी-लिखी लड़की से व्याह करने का निश्चय कर लिया। लेकिन उसके सामने एक समस्या थी-वो कभी अपना गाँव छोड़कर दूसरे गाँव तक नहीं गया। फिर शहर में जाकर अपना उद्देश्य कैसे पूरा पायेगा?
बाँके के गाँव के पास ही एक कस्बा था जिसमें लता अपनी सौतेली माँ के साथ रहती थी। जब वो बहुत छोटी-सी थी उसके पिता की मृत्यु हो गई थी।
उनकी मृत्यु के बाद संग्रामसिंह सारी जायदाद की देखभाल करता था। वो लता से शादी करके उसकी सारी जायदाद पड़प करना चाहता था। उसके षड़यंत्र में लता की सौतेली माँ भी शामिल थी। अपने इन सपनों का साकार बनाने के लिए उसने लता को बचपन से ही चिमगादड़ों से डरागर रक्खा था। लता की हिम्मत नहीं थी कि वो संग्रामसिंह की मुखाल्फ़त कर सके। जब लता को मालूम हुआ कि संग्रामसिंह उससे शादी करनेवाला है और निमंत्रण पत्र भी छप चुका है तो वो भागी हुई अपनी सहेली के घर पर पहुँची। सहेली के भाई ने उसे शहर जाने का मशवरा दिया और लता को यक़ीन दिलाया कि शहर में वो अपने वकील चाचा से कहकर न सिर्फ़ उसकी जायदाद उसे वापस दिलवा देगा बल्कि संग्रामसिंह से उसका पीछा भी छुड़वा देगा।
रेलगाड़ी में बाँके और लता की मुलाकात हुई। बाँके अपनी शादी के लिए लड़की ढूँढने जा रहा था और लता एक जबरदस्ती की शादी से बचकर भाग रही थी। लेकिन उनकी ये मुलाक़ात कुछ ही देर के लिए हुई। बाँके को उस डिब्बे से उतार दिया गया क्योंकि वो फस्र्टक्लास का डिब्बा था और उसके पास दूसरे दर्जे का टिकट था।
शहर पहुँचते ही बाँके सौदागरमल नाम के दलाल के चक्कर में फँसा। सौदागरमल ने बाँके के भोलेपन का फायदा उठाकर एक वेश्या को उससे भिड़ा दिया। लेकिन बाँके उसके दाव से बच निकला। सौदागरमल एक दूसरी लड़की बाँके के पास लाया ये लता थी। दोनों एक दूसरे से मिलकर बहुत खुश हुए। कुछ ऐसा चक्कर चला कि बाँके और लता को होटल के कमरे में भगवान कृष्ण के सामने शादी करनी पड़ी।
लेकिन संग्रामसिंह ने इस शादी को कचहरी के ज़रिये रद्द करवा दिया। लता वापस संग्रामसिंह के चंगुल में फँस गई संग्रामसिंह ने इस बार शादी के कार्ड़ नहीं छापे बल्कि लता को सीधा ब्याह की वेदी पर बिठा लिया। बाँके को जब मालूम हुआ तो वो लता के घर पहुँचा। उसने संग्रामसिंह की ख़ूब पिटाई की और लता को गाँव में अपने घर ले आया।
जब बाँके को ये पता चला कि संग्रामसिंह उसके बाप का हत्यारा है तो अपने आपे में नहीं रहा। उधर संग्रामसिंह बाँके के हाथों अपनी हार न हज़म कर सका। उसने लता को जान से मारने का काम अपने कारिंदे चरनदास को सौंपा।
क्या चरनदास अपने वीमत्स उद्देश्य में सफल हुआ? पार्वती का क्या हुआ? बाँके अपने पिता की हत्या का बदला ले सका या नहीं? अगर ले सका तो किस तरह?
इन सब सवालों के जवाब के लिए “दिलदार” देखिये।
[From the official press booklet]